तू मेरे गांव को गँवार कहता है

तेरी बुराइयों को हर अख़बार कहता है,
और तू मेरे गांव को गँवार कहता है।

ऐ शहर मुझे तेरी औक़ात पता है,
तू बच्ची को भी हुस्न ए बहार कहता है।

थक गया है हर शख़्स काम करते करते,
तू इसे अमीरी का बाज़ार कहता है।

गांव चलो वक्त ही वक्त है सबके पास,
तेरी सारी फ़ुर्सत तेरा इतवार कहता है।

मौन होकर फोन पर रिश्ते निभाए जा रहे हैं,
तू इस मशीनी दौर को परिवार कहता है।

वो मिलने आते थे कलेजा साथ लाते थे,
तू दस्तूर निभाने को रिश्तेदार कहता है।

बड़े-बड़े मसले हल करती थी पंचायतें,
अंधी भ्रस्ट दलीलों को दरबार कहता है।

अब बच्चे भी बड़ों का अदब भूल बैठे हैं,
तू इस नये दौर को संस्कार कहता है।

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Bahut door chale aaye h hum

sabbewafa shayari

बहुत दूर चले आयें है हम अपने गाँव और मकान से !
बड़ी कीमत चुकानी पड़ी है ऐ शहर बेहतर जिंदगी बनाने में !!

Bahut door chale aaye h hum apne gaon or makaan se !

Badi kimat chukani padi h ey shahar behtar jindgi banane me !!

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मंदिर में प्रसाद लेने के लिए लाइन ….

bachpan ki yaade

छोड़ आये उन कच्ची गलियों को जहाँ पुरे दिन खेल के शाम हुआ करती थी

और शाम के समय चारो तरफ रंगीन हवा चला करती थी

हर रोज शाम को घर के पास हनुमान मंदिर में सभी खेला करते थे

और मंदिर में प्रसाद लेने के लिए लाइन लगा करती थी

उस प्रसाद को भोले से चेहरे से लगा के खाने में कुछ अलग ही  दुआ कबूल होती थी

रात में दादी के पास हजार किस्सों वाली जुबानी किताब हुआ करती थी

मेरे गाँव ( लालगढ़ जाटान  )  में  तो जनाब खुशियों की चाबी मिला करती थी

:-  संदीप मारवाल

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